अंततोगत्वा(anttogatwa)

ऐसी है विवशता
सिर्फ मुझे है पता
और कोई भी नहीं जानता
क्या है मेरे मन में
कौन सी व्यथा
बचपन से लेकर
बुढ़ापे की उम्र तक
पल पल सालती रही है
ढेरों हैं अनुत्तरित प्रश्न
जिसके जवाब में
सिर्फ टालती रही है
मेरी व्यग्रता उफान पर है
सत्य की खोज करने में
समाज का डर है
मेरी यह विवशता
तोड़कर सारे बन्धन
एक इतिहास रचना चाहती है
जो कलंक लग चुका है
मेरे स्वर्गीय पूर्वजों को
उससे बचना चाहती है
एक झूठ को सच साबित करने
लिख दिए कितने पुराण
धर्म शास्त्र की उपाधि देकर
चलाया कर्मकाण्ड अभियान
अपनी ही दुनिया में
अपने ही लोगों पर
तनिक भी दया नहीं आई
खोद डाली ऐसी अंधविश्वास की खाई
जहां सिर्फ विघटन ही संभव है
अज्ञानता का यह जहर
भर दिया पूरे समाज पर
दे दी कुंठा की लाईलाज बीमारी
जो पीढ़ी दर पीढ़ी है अब तक जारी
कहां गई मानवता
किसी को नहीं इसका पता
पूजा पाठ कर्म कांड
बन गए कमाई का जरिया
नर्क का भय
स्वर्ग का लोभ
कर्मकांडियों ने देश व समाज को
अंध विश्वास का क्या खूब तोहफा दिया!!
इस झूठ का पर्दाफाश होना चाहिए
अंततोगत्वा हमें हमेशा ही
सत्य का साथ देना
न्याय का पक्ष लेना
मन में अटल विश्वास होना चाहिए!

*पद्म मुख पंडा स्वार्थी*
*महापल्ली*
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