अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में-दूजराम -साहू

अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में

करूण रस –

अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में, कर जोर विनती कह रही !
सूर – कबीरा के “धरा” में,देखो “बेटी” जुल्म सह रही !!

यहाँ – वहाँ, जाऊँ – कहाँ, पग – पग में बैठा दानव है !
किसको मैं असुर कहूँ” मां”, किसको मानूंगी मानव है !!
इंसानियत अब नजर न आता , हैवानियत “बेटी” सह रही !
अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में, कर जोर विनती कह रही !!

अब नहीं प्रेमभाव नयन में,बहती रगों में क्रूरता है !
हैवान विचरण करे जहाँ में, दरिंदे पहरा करता है !!
इन शैतानों की शिकार “बेटी”, देखो कैसे सह रही !
अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में, कर जोर विनती कह रही !!

न भेजो मुझे इस “मही”में, मां कोख में मुझे रहने दो !
न सह सकूँ दुख कलिपन में, “भू”बंजर “बेटी” बिना रहने दो !!
सह न सकूँ “मां” अब तेरी आंसू , अरजी “बेटी” ये कह रही !
अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में, कर जोर विनती कह रही !!

दूजराम साहू

निवास -भरदाकला
तहसील- खैरागढ़
जिला- राजनांदगांव (छ.ग.)

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