अब बुरा सा लगता हूँ…

हूँ मुक़म्मल पर ज़रा सा लगता हूँ,
हर किसी को अब बुरा सा लगता हूँ…

कलतलक ये खेल पूरा मेरा था,
आज मैं खुद मोहरा सा लगता हूँ…

था जिसे मैं जान से भी क़ीमती,
लो उसी को सरफिरा सा लगता हूँ…

नफरतों में इश्क़ की सुनके ग़ज़ल,
बुज़दिलों को बेसुरा सा लगता हूँ…

जो मेरी नज़रों से छिपते फिरते थे,
अब उन्हीं को मैं डरा सा लगता हूँ…

बोल दूँ मुझको नहीं है इश्क तो,
लड़कियों को मसखरा सा लगता हूँ…

@चंदन

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