KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

अब वह खामोश है(Ab wah khamosh hai)

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पिता की फटकार खाने वाला
मां के लिए सर दर्द।
नासमझ,लापरवाह ,आलसी
किसी की एक नहीं सुनता।
बचपन की दौड़ में 
न जाने क्या क्या बुनता?
ख्वाबों में।
उलझा रहता अजीब कश्मकश में ।
शायद सबसे अलग था ।
घर से जब भी निकलता ,
दिखाई पड़ती सबसे बड़ा घर,
यह दुनिया।
जहां असली आजादी थी ।
जहां असीम सुखकारी संपदा हैं-
” खुली हवा,ताजा पानी, हरे-भरे वन ।””
यह कोई चलचित्र से कम नहीं
वह खोल देता रंगों की पिटारी
और नाचने लगती कागज के मंच पर
उसकी खींची हुई लकीरें
देख कर ऐसा लगता मानो
हम दुनिया से जुड़े ही कब थे ?
पर जालिम समाज ;
यही समझती
आसमान से कोई पतंग कट रहा है ।
देखो, बालक मंजिल से भटक रहा है ।
बाँह खींचकर जोर देकर कहता –
” सुधर जा!  अभी भी वक्त है ।”
शायद आज वो अपनी हरकतों से
बाज़ आ गया है पर
फर्क यही कि 
अब वह खामोश है।
✒️ मनीभाई’नवरत्न’
“तारे जमीं पर” फिल्म से प्रेरित कविता

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