अलबेला बचपन पर हास्य कविता

अलबेला बचपन पर हास्य कविता

मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!
अंतरमन में भरा उजाला,बाहर सघन अँधेरा था!
खेतों की पगडँडियाँ मेरे,जोगिँग वाली राहें थी!
हरे घास की बाँध गठरिया,हरियाली की बाँहें थी!
चलता रहता में अनजाना,माँ बापू का पहरा था!
मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!!…….!!(१)
गाय भैंस बहुतेरी मेरे,बकरी बहुत सयानी थी!
खेतों की मैड़ों पर चरकर,बनती सबकी नानी थी!
चरवाहे की नजरें चूकी,दिन में घना अँधेरा था!
मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!!……..!!(२)
साथी ग्वाले सारे मेरे, ‘झुरनी’ सदा खेलते थे!
गहरी ‘नाडी’ भरी नीर से,मिलकर बहुत तैरते थे!
चिकनी मिट्टी का उबटन था,मुखड़ा बना सुनहरा था!
मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!!…….!!(३)
मोरपंख की खातिर सारे,बाड़ा बाड़ा हेर लिया!
तब जाकर पंखों का बंडल,घर में मैनें जमा किया!
एक रुपये में बेचे सारे,हरख उठा मन मेरा था!
मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!!……!!(४)
‘बन्नो’ की बकरी को दुहकर, हम छुप जाते खेतों में!
डाल फिटकरी बहुत राँधते,और खेलते रेतों में!
‘कमली- काकी’ देय ‘औलमा’,दूध चुराया मेरा था!
मेरा बचपन बड़ा निराला,कुचमादों का डेरा था!!……!!.(५)
भवानीसिंह राठौड़ ‘भावुक’
टापरवाड़ा!!
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