KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आगे बढ़े चलेंगे हिन्दी कविता

आगे बढ़े चलेंगे हिन्दी कविता



यदि रक्त बूंद भर भी होगा कहीं बदन में,
नस एक भी फड़कती होगी समस्त तन में,
यदि एक भी रहेगी बाकी तरंग मन में,
हर एक साँस पर हम आगे बढ़े चलेंगे।

वह लक्ष्य सामने है, पीछे नहीं चलेंग।
मंजिल बहुत बड़ी है पर शाम ढल रही है,
सरिता मुखीवों की आगे उबल रही है,
तूफान उठ रहा है, प्रलयाग्नि जल रही है,
हम प्राण होम देंगे, हँसते हुए जलेंगे।
पीछे नहीं हटग, आगे बढ़े चलेंगे।


अचरज नहीं कि साथी भग जाएं छोड़, भय में,
घबराएँ क्यों, खड़े हैं भगवान् जो हृदय में,
धुन ध्यान में फंसी है, विश्वास है विजय में,
बस और चाहिए व्या, दम एकदम न लेंगे।
जब तक पहुँच न लेंग, आगे बढ़े चलेंगे।

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