आना कभी गाँव में–बलवंतसिंह हाड़ा

*मेरा गाँव*

धरती के आंगन मे
अंबर की  छाँव में
आना कभी गाँव में।।
बरगद की डाल पे
गाँव की चौपाल पे
खुशी के आँगन में
झुला झुलने को
आना कभी गाँव में।।
संध्या के गीत सुनने
लोक कलाए देखने
दादी की कहानी सुनने
आना कभी गाँव में।।
खेतों की मेड़ पे
सरसों के खेत पे
हरियाली देखने
आना कभी गाँव में।।
सावन के झुले कभी
कोयल की बोली मीठी
बरखा रानी की धारा
भोजन की थाल पे
आना कभी गाँव में।।
होली के रंग खेलने
दीवाली के दीप जलाने
राखी पे धागा बाँधने
ईद की सेवईयाँ चखने
शादी की धूम देखने
आना कभी गाँव में।।
बेहरूपिया का रुप देखने
बच्चों की धमाल देखने
चाय की मनावर देखने
बलवंत को मिलने
आना कभी गाँव में।।

*—बलवंतसिंह हाड़ा*

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