KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ऐ जहां

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न‌ई कविता
ऐ जहां
ऐ जहां तुझे हुआ क्या
हर तरफ धुंध धुआं धुआं,
तूने क्या कर लिया ।
अपनी व्यवहार त्याग,
मानव सा हुआ बहरूपिया।
तू इन मानवों सा ना कर,
ए तो  हैं स्वार्थी, किसी का ना हुआ।
तू तो हैं परमार्थ के लिए
देख कोई पक्षी बाग से ना गुजरा।
छोड़ जिद शांत हो जा,
निकलने  दे सूरज पुनः वही सबरा ।

मानक छत्तीसगढ़िया
९१७४२१३१००