ऐ नववर्ष !

*ऐ नववर्ष !*
आज सारा विश्व उल्लसित है
नव वर्ष में नव-उमंगों के साथ,
विगत की खट्टी-मीठी यादों को,
इतिहास के पन्नों में बाँट,
स्वागत है तेरा.. नया साल !  
प्रतिक्षित नयन तुम्हें निहार रहे हैं
लेकर कई सवाल।

शायद!तुम कुछ नया छोड़ सको
और भारत के इतिहास में
स्वर्णिम-पन्ने जोड़ सको

क्या सत्य ही तुम
कुछ कर पाओगे?
देश के गहरे जख़्म भर पाओगे ?

अरे!!
देश का एक वर्ग तो
तुम्हें जानता ही नहीं ।
क्या है नववर्ष?क्या उमंगें?क्या हर्ष?

जिनकी सुबह भूख से होती हो ,
तब रात खाने को सूखी रोटी हो।
और किसी-किसी को वो भी नसीब नहीं,
बदन पर कपड़े
और सिर पर छत भी नहीं,
वो क्या जाने क्या है नया साल ?
जो जीवन जीते हैं खस्ता हाल।

इन झूठे स्वप्न और आडंबरों से,
दिन और महीनों के व्यर्थ कैलेंडरों से
उनका क्या वास्ता?
जिनका जीवन है काँटों भरा रास्ता ।

जिस दिन उनके घर चुल्हा जलता है
आँखों में नववर्ष का सपना पलता है।

झाँककर देखो उनके दिलों में,
उनको साल का कुछ पता नहीं
जो जीते हैं फूटपाथ पर
और मरते भी वहीं हैं।
न हो नसीब जिनके लाशों को क़फन
उनके जीवन में कभी नववर्ष होता नहीं है ।

ऐ नववर्ष!
क्या सच में तुम.. कुछ कर पाओगे ?
भूखों को रोटी, गरीबों को घर दे पाओगे?
हिंसाग्रस्त देश को, कोई राह दोगे?
नफरत भरे दिलों में, चाह दोगे?

गर ऐसा है तुम्हारे दामन में कुछ
तो स्वागत है तुम्हारा हर्षित मन से
वरना तुम भी यूँ ही बीत जाओगे
बीते वर्ष की तरह रीत जाओगे।।

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति!?????

*ऐ नववर्ष !*
आज सारा विश्व उल्लसित है
नव वर्ष में नव-उमंगों के साथ,
विगत की खट्टी-मीठी यादों को,
इतिहास के पन्नों में बाँट,
स्वागत है तेरा.. नया साल !  
प्रतिक्षित नयन तुम्हें निहार रहे हैं
लेकर कई सवाल।

शायद!तुम कुछ नया छोड़ सको
और भारत के इतिहास में
स्वर्णिम-पन्ने जोड़ सको

क्या सत्य ही तुम
कुछ कर पाओगे?
देश के गहरे जख़्म भर पाओगे ?

अरे!!
देश का एक वर्ग तो
तुम्हें जानता ही नहीं ।
क्या है नववर्ष?क्या उमंगें?क्या हर्ष?

जिनकी सुबह भूख से होती हो ,
तब रात खाने को सूखी रोटी हो।
और किसी-किसी को वो भी नसीब नहीं,
बदन पर कपड़े
और सिर पर छत भी नहीं,
वो क्या जाने क्या है नया साल ?
जो जीवन जीते हैं खस्ता हाल।

इन झूठे स्वप्न और आडंबरों से,
दिन और महीनों के व्यर्थ कैलेंडरों से
उनका क्या वास्ता?
जिनका जीवन है काँटों भरा रास्ता ।

जिस दिन उनके घर चुल्हा जलता है
आँखों में नववर्ष का सपना पलता है।

झाँककर देखो उनके दिलों में,
उनको साल का कुछ पता नहीं
जो जीते हैं फूटपाथ पर
और मरते भी वहीं हैं।
न हो नसीब जिनके लाशों को क़फन
उनके जीवन में कभी नववर्ष होता नहीं है ।

ऐ नववर्ष!
क्या सच में तुम.. कुछ कर पाओगे ?
भूखों को रोटी, गरीबों को घर दे पाओगे?
हिंसाग्रस्त देश को, कोई राह दोगे?
नफरत भरे दिलों में, चाह दोगे?

गर ऐसा है तुम्हारे दामन में कुछ
तो स्वागत है तुम्हारा हर्षित मन से
वरना तुम भी यूँ ही बीत जाओगे
बीते वर्ष की तरह रीत जाओगे।।

सुधा शर्मा
राजिम छत्तीसगढ़
1-1-2019
राजिम छत्तीसगढ़
1-1-2019

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