KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कर्मठता की जीत (karmathta ki jeet)

स्वाभिमान मजबूत है , पोषण का है काज ।
बैठ निठल्ला सोचता ,  बना भिखारी आज ॥
लाचार अकर्मण्यता , मंगवा रही भीख ।
काज बिना कर के करे , कुछ तो उससे सीख ॥
आलसी लाचार बने , करे गलत करतूत ।
कर्मठता सबसे बड़ी , कर देती मजबूत ॥
मिलता है मेहनत से , जब भर पेट अनाज ।
खाली क्यों बैठा रहा , अन्न को मोहताज ॥
दान करते रहें सदा , हो  पात्र संज्ञान ।
कुपात्र-दान हो नहीं  , बढ़े भिखारी जान ॥
सोच समझ के कीजिये , यह अमूल्य है दान ।
वरना होगा ही नहीं , समस्या का निदान ॥
बोना बीज सुकर्म के , पुण्य-फसल लहराय ।
हर मौसम में फल मिले , मन पुलकित हो जाय ॥
जीवन कविता रूप है , समन्वय अलंकार ।
भावों की जब लय रहे , मनभावन आकार ॥
कर्मठता की लेखनी , रचना है इतिहास ।
कर्म स्वयं ही बोलता , यही सुखद अहसास ॥
भावों की खेती करें , रखना बस ये ध्यान ।
फसल उगाना लक्ष्य की , बाकी तजें सुजान ॥
मधु सिंघी
नागपुर ( महाराष्ट्र )
9422101963