कर्म-देवता(karm devta)












ईश का यह रहस्य वरदान,
पूर्वजन्म कर्मों का प्रसाद।
अंतिम परिणाम निरख इसका,
भर जाता मन मेरा विषाद।।1

गत दिवस चौक-चौराहों पर,
थीं जन-सैलाबें जमी हुईं।
गली,नुक्कड़ औ’मुहल्लों पर
थीं सुबह गुफ़्तगू छिड़ी हुईं।।2।।
जो बोया था वह जीवन भर,
फल आज उसी का पाया है।
दारुण-दुर्घटना देख अलि!
सबका तन-मन थर्राया है।।3
जो मेरा-मेरा जपते हैं,
लूटते मनुज युग हाथों से।
स्वार्थान्ध,कृपण,घट -भर्ता का,
घट-भरता है कब लाखों से??4
घट भरने को उस अंधे ने,
ना जाने क्या-क्या यतन किये?
छल,कपट,झूठ,धोखा,चोरी,
प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष किये।।5
छलिया था अति पाखंडी वह,
दुर्व्यसनी, मद्यप महप्रवीन।
झरते थे अधर अमृतवाणी,
लगे सभ्य,शिष्ट,महाकुलीन।।6
धन ,देश का लुटा था उसने,
निज कर्मों से मुँह मोड़ा था।
भ्राता का धन अघ -सा निगला,
स्वजनों से भी नाता तोड़ा था।।7
खूं के रिश्तों का किया ख़ून,
बाकि रिश्तों की कहाँ बिसात?
किस-किस को छला,नहीं लूटा,
सुन नर-पिशाच का करामात।।8
लालच की नहीं थाह उसकी,
चाहत नभ -दोहन रखता था।
था वह दरिद्रों में महादरिद्र,
बस धन-धन जपता रहता था।।9
जग लुट अकूत धन संचय कर,
बहुतले इमारत बहु ताने।
पर क्या मजाल किसी भिक्षुक को
मुट्ठी भर दिया कभी दाने।।10
गाड़ी,मोटर,नौकर,चाकर
अनगिन,पर भी सन्तोष नहीं।
सोना-चांदी-हीरे-मोती
आदिक रत्नों की कमीं नहीं।।11
विवेक नष्ट ,पथ-भ्रष्ट पुरुष
का विषम पतन हो जाता है।
तांडव करता सर महाकाल,
उसे कौन राह दिखाता है??12
सखि!स्वर्ग -नर्क इस धरती पर,
कृतकर्म का फल सभी पाते हैं।
कालपुरुष के प्रचंड कोप,
से कब कोई बच पाते हैं।।13
कुपित हो काल ने दिया दंड,
तप्त रक्त बहा अमानव का ,
निकला हत्यारा बेटा ही,
बद हश्र होता नर-दानव का।।14
कुदृष्टि काल के पड़ते ही,
सब पल में चकनाचूर हुआ।
निजपुत्र के हाथों मरने को,
एक पिता यहाँ मजबूर हुआ।।15
ऊंच-नीच-राजा-रंक भेद
न कालपुरुष देखा करते।
दोषी को देते उचित दंड,
न रहम किसी पर किया करते।।16
ना कालपुरूष यह अलौकिक,।।।
कृतकर्म मनुज का ही जानो।
कर्मानुरूप फल पाते जन,
तुम वेदवाक्य इसको मानो।।17
था पापकर्म से संचित धन,
जिस-तिस हाथों में जाना था।
बन्दी-कुपुत्र लख पति वियुक्ता
पत्नी का नहीं ठिकाना था।।18
यह कथा श्रवण जो तुमने की,
न लोभी धनिक की मात्र कथा।
न जाने कित जूझते रहते?
अज्ञानता की उपज यह व्यथा।।19
तप,त्याग,प्रेम,भाईचारा,
ममता,करुणा क्या होती है?
भूल,दुर्गुण लिप्त आज मनुज,
दशा देख भारत-माँ रोती है।।20
यह कथा सुना वक्ता सखि ने,
पलभर तक चुप्पी साध लिया।
फिर भर निःश्वास सहजता से,
दर्शन-सा ज्ञान अगाध दिया।।21
था मृत धनिक लोभी-लालची,
संस्कार-ज्ञान कहँ पाया था?
आत्मोन्नति नीतिगत शिक्षा से,
यह पुत्र को नहीं पढ़ाया था।।22
यह नहीं कि बेटा निरक्षर था,
विलायत हो यहाँ आया था।।
था वह पढ़ाई में बहुत दक्ष,
पर शिक्षित हो नहीं पाया था।।23
वह शिक्षा कहो किस मतलब का?
संस्कार गुणों का नाम नहीं।
जो मानवता को जाय निगल ,
उस शिक्षा का यहाँ काम नहीं।।24
धनों में महान विद्या धन है,
विकास इसी से सर्वांगीण।
जग में नहीं इससे बड़ सुहृद,
विवेक ज्ञान इससे है निशिदिन।।25
संस्कारविहीन,अशिक्षित लोग
यह क्रूर क़दम उठाते हैं।
जीते हैं जीवन नरपशु-सा,
स्वजनों का रक्त बहाते हैं।।26
धनोन्माद मत्त सभी मानव,
विवेक से हत हो जाते हैं।।।।
यारी,दोस्ती,रिश्ते-नातों
का मोल समझ कब पाते हैं??7
धन का महत्व जीवन में है,
पर अति संचय कर क्या करना?
चरम लक्ष्य जीव का नहीं यह,
क्यों भूला नर उसे है मरना??28
धन-संचन-भक्षण-जन्म-मरण
गति क्षुद्र जीव-जानवर की है।
बन कर्मवीर जग नाम रहे,
यही परमगति मानव की है।।29
जब तक जीवन,सब अपने हैं।
मृतकों से किसका है नाता?
मृत जीव गति इक महा रहस्य।
विरले ही समझ इसे पाता ??30
जिस धन का जन उपभोग करे,
केवल उतने का स्वामी है।
बाकि का पहरेदार केवल,
अपना कहना नादानी है।।31
काम,क्रोध,मद,मोह,लोभादि
सम,नहीं शत्रु मानव के हैं।।।
बहाते रक्त,मानवता का,
ये महा अस्त्र दानव के हैं।।32
30/04/2019
युगल किशोर पटेल
सहायक प्राध्यापक(हिंदी)
शासकीय वीर सुरेंद्र साय महाविद्यालय गरियाबंद
जिला-गरियाबंद(छत्तीसगढ़)


इस कविता के प्रत्येक चरण में 16 मात्रा वाले छंद का प्रयोग किया गया है:-
मानव जीवन ईश्वर का रहस्यमय वरदान है।आज के मानव का एकमात्र उद्देश्य अति धन-संग्रह है,जिसके लिए वे अपनों का भी खून बहाने से नहीं हिचकते।वे भूल गए हैं कि जीवन क्षणिक है।मृत्यु पश्चात बेईमानी से संचित उस धन से,रिस्ते-नातों से मृतक का कोई सम्बन्ध नहीं रहता।आज का इंसान पशुओं से भी गया गुजरा जिंदगी जी रहा है।
स्वर्ग-नरक इसी धरती पर है।सब कृतकर्म के अनुरूप ही फल पाते हैं।
प्रस्तुत कविता में एक रात ऐसे ही लालची-लोभी एक धनिक की उसके ही कुपुत्र के हाथों हत्या,पुत्र का बन्दी जीवन जीना,पत्नी का दर-बदर की ठोकरें खाना,जमा धन का जिस-तीस हाथ मे चला जाना हमारी संस्कृति, संस्कार की ही हत्या है।
प्रथम छंद में कवि की चिंता व विषाद का वर्णन है।दूसरे से अंतिम छंद तक वक्ता सखि,श्रोता सखि को सारी कथा सुनाती जाती है।
प्रस्तुत कविता में यथार्थता,भक्ति,नीति,दर्शन सब कुछ है।
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