KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कितना कुछ छूट गया(kitna kuchh chhut gya)

कितना कुछ छूट गया



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वक्त के साथ बदलती तस्वीरें
बदल जाती पल में तकदीरें
बदलती मानसिकता
बदलते जीने के अंदाज।
अंधाधुंध सुख साधनों से
बढती जीवन की यांत्रिकता
बढता आर्थिक भार
घटता संजीवन व्यवहार
टूटती रिश्तों की डोर
नहीं रहा हाथ में छोर।
अपनाया गया एकाकीपन
अपनों का कथित पिछड़ापन
पीढियों का बढता अंतराल
बैगानेपन का होता आग़ाज़
विश्व की होड़ में
अंधी दौड़ में
कितना कुछ छूट गया?
कितना कुछ लुट गया?
सुखों की मृग मरीचिका
निगलती गई संजीवन जल
छा गये राज पथों पर
कितने बीहड़ जंगल।
क्यों नहीं समझ आ रहा?
भय ही क्यों बढता जा रहा?
नित नूतन की चाह में
पुरातन, क्यों नहीं बच पा रहा?
जो केवल अपना है
सुख शांति का सपना है।
भूत का गौरव
वर्तमान का रक्षक
और भविष्य का आधार।
बुलंद होते जिससे
निर्माण के स्वर
पल्लवित होती
उल्लास की वल्लरियाँ
झूम झूम जाती
गगनचुंबी अरमान पादप टहनियां
और करती उद्घाटित
सनातन रहस्य!
जड़ों से जुड़े रहने का
असंख्य पल्लवों का
टहनी पर, टिके रहने का
भारी विप्लव और तूफां सहकर,
अपने अस्तित्व में, बने रहने का।
पुष्पाशर्मा “कुसुम”