कुण्डलिया

कुण्डलिया

छटा निराली प्रात की,पूरब दिसि में आज।
कलुष विभा बीती अभी, जन -मन करते काज।
जन-मन करते काज,अलस सब छूटा जग का।
नई चेतना सहित,मुसाफिर निकला मग का।
बाल रवि मन भाए, लगे सिंदूरी थाली।
फुनगी बीच लुभाय,तरणि की छटा निराली।

वन्दना शर्मा
अजमेर।

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