कोमल और बेदाग़ होता है बचपन- विजिया गुप्ता समिधा की कविता (komal aur bedag hota hai bachpan)

*बचपन*

संगमरमर की तरह,
कोमल और बेदाग़ होता है,
बचपन।
मनचाहे रूप में,
तराशा जा सकता है उसे।
सहज होता है,
एक सार्थक स्वरूप देना,
यदि मूर्तिकार सशक्त हो।
फूल की तरह नाज़ुक,
होता है बचपन।
बड़े जतन से सहेजता है,
माली जिसे।
बिखरने और मुरझाने नहीं देता,
किसी भी कीमत पर।
कुम्हार के चाक पर,
गीली मिट्टी के ढेले जैसा।
होता है बचपन।
जैसे चाहें,गढ़ सकते हैं उसे।
किन्तु,संगमरमर का 
कोई टुकड़ा
कैसे आकार पाए,
बिना मूर्तिकार के।
कोई फूल कैसे बचे,
मुरझाने और बिखरने से,
बिना माली के।
कोई मिट्टी का ढेर,
कैसे गढ़े अपना रूप,
बिना कुम्हार के।
ऐसे ही कुछ फूलों के लिए,
चलो माली बन जाएं हम।
सवारें उनकी जिंदगी,
एक मूर्तिकार की तरह।
और गढ़ें उनके चरित्र को,
एक कुम्हार की तरह।
———
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़
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