क्रान्ति की राह पर -प्रकाश गुप्ता हमसफ़र

*” क्रान्ति की राह पर ”*
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हमारे ज़िस्म को
बोटी-बोटी काट कर
हमारी ज़िन्दा रूह की
चीखों को निकालकर
हमारे ख़ौलते खून को
और ज़रा उबालकर
हमारे भीतर के
इंसान को भी मारकर
तुम बाँट देना
हाँ-हाँ! – – – –
तुम बाँट देना
शिक्षा के मठाधीशों
क्रूरता के तानाशाहों
पाखंड के ठेकेदारों
और – – – –
दमनकारी नौकरशाहों के पास
ताकि – –
वे नोंच लें हमारी बोटियाँ
चबा लें हमारी हड्डियाँ
निगल लें हमारी अस्थियाँ
दफ़्न कर दें हमारी समाधियाँ
छीन लें हमारी रोटियाँ
देख लें हमारी बर्बादियाँ
गिन लें हमारी मुंडियाँ
और – – – –
तबाह कर दें हमारी बस्तियाँ
हो जाए – –
उनके झूठे
वहम की जीत
फिर कैसा ये न्याय
कैसी ज़माने की रीत
धारा के विरूद्ध
कोई धारा है विपरीत
इस कठिन राह पर भी
हम रहें न भयभीत
लगा लें – – – –
वे अहंकारों का
पुरजोर नारा
भर दें – – – –
लोगों के कानों में
मृषा और अंगारा
करोड़ों मुसीबतें आएं
फिर भी
न करें हम अपने
अधिकारों से किनारा
देखो-देखो – –
ओ जगत के चारागर देखो!
जीवित रहेंगी
हमारी विचारधाराएँ
हमारे मरण
हमारी आह पर
कि मुट्ठी भर लोग
फिर से मिटने जा रहे हैं
‘क्रान्ति की राह पर’ ।।


प्रकाश गुप्ता *”हमसफ़र”*
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युवा कवि एवं साहित्यकार
सह शैक्षिक सलाहकार
रायगढ़ (छत्तीसगढ़) से
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