क्षितिज

*”क्षितिज“*
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रवि-रश्मियाँ-रजत-धवल
पसरीं वर्षान्त की दुपहरी
मैना की चिंचिंयाँ-चिंयाँ से
शहर न लगता था शहरी
वहीं महाविद्यालय-प्रांगण में
प्राध्यापकों की बसी सभा थी
किंतु परे ‘वह’ एक-अकेला
छांव पकड़ना सीख रहा था !

धूप की ओट में बैठा ‘क्षितिज’
ख़ुद के भीतर जाना सीख रहा था !!

मधु-गीत लिये , मधु-रंग लिये
दिये वर्ष ने कई प्रीति-प्रस्ताव
पीछे वैभव-सुख छूटा जाता था
किंतु न मोड़ा ‘उसने’ जीवन-प्रवाह
जहाँ जाना उसे था, ‘वह’ चले चला..
नित-नित आगे बढ़ना सीख रहा था !

धूप की ओट में बैठा ‘क्षितिज’
ख़ुद के भीतर जाना सीख रहा था !!

कितने पराये यहाँ अपनों के वेश में
कितने अजनबियों का साथ मिला
प्रतिक्षण घात मिला , संघात मिला
विश्वासों को रह-रह आघात मिला
हर चोट, हर धोखे से संभलता ‘वह’
चेहरों के मुखौटे गिनना सीख रहा था !

धूप की ओट में बैठा ‘क्षितिज’
ख़ुद के भीतर जाना सीख रहा था !!
*-@निमाई प्रधान’क्षितिज’*
    रायगढ़,छत्तीसगढ़
     31/12/2018

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