खुद से परिभाषित ना कर तू

खुद  से  परिभाषित ना  कर तू 

खुद   को   यूँ   खुद   से  परिभाषित   ना  कर  तू

मंज़िल  दूर  नहीं   खुद  को  वंचित   ना   कर  तू

रोड़े, ईंट, पत्थर, अड़चनें  बहुत  पड़े राहों में तेरे

मार ठोकर  सबको खुद को बस आरोहित कर तू

वक़्त  के   थपेड़े  तुझ   को  भी  कर  देंगे  अधमरे

इतिहास धुंधला पड़ा, खुद को बस अंकित कर तू

अंदर – ही – अंदर जलाता  क्यों तू, संग चराग़ के

हाथ उठा लपक चाँद, खुद को  प्रायोजित कर तू

कल का सूरज  किसने देखा है, रात  बहुत लम्बी है

अंदर कई प्रकाशपुंज तेरे, खुद को आलोकित कर तू

शून्य  ही  शून्य  बस आज  बिखरा  पड़ा  है  जहां में

छोड़  जहां  की  चिंता,  खुद  को आंदोलित  कर  तू

सूरज सर पर आएगा, साया तेरा भी सिमट जायेगा

साये  से  निकल  बाहर, खुद  को ना बाधित  कर तू

‘अजय’   है  तू,  खुद  को   परिभाषित  ना   कर तू

मंज़िल   दूर   नहीं,    खुद  को  वंचित   ना   कर  तू

—- अजय ‘मुस्कान’

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अजय कुमार "मुस्कान "

जन्म तिथि - 12 जनवरी 1972 पिता का नाम - श्री जटा शंकर मिश्र माता का नाम - श्रीमती भगवती मिश्र शिक्षा - डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग रोजगार - टाटा स्टील में कार्यरत पता - 32/ L5, क्रास रोड न0-5, एग्रिको, जमशेदपुर – 831009 ( मूल निवासी : मैथिल काशी नगरी ग्राम - बनगाँव, जिला - सहरसा , बिहार ) साहित्यिक विधा - छंदमुक्त कविता / गज़ल/ हास्य - व्यंग्य लेखन भाषा ज्ञान - हिंदी, मैथिली, अंग्रेजी उपलब्धि - दो संयुक्त प्रकाशित पुस्तकें १) प्यारी बेटियाँ- साहित्यपीडिया पब्लिशिंग २) सृजन गुच्छ ( प्रथम )- समदर्शी प्रकाशन  जमशेदपुर से बाहर कई मंचों पर प्रस्तुति  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन  विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित  तकनिकी क्षेत्र में कई राष्ट्रिय सम्मान