खोज रहा नीर नेह(khoj raha neer neh)

.          *उडियाना छंद विधान*
२२मात्रिक छंद–१२,१० मात्रा पर यति,
यति से पूर्व व पश्चात त्रिकल अनिवार्य,
चरणांत में गुरु  (२)
दो दो चरण समतुकांत हो।
चार चरण का एक छंद कहलाता है।
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.          *खोज रहा नीर नेह*
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वरुण देव  कृपा करे, जल भंडार  भरें।
जल से सब जीव बने, जल अंबार करें।
दोहन मनुज ने किया, रहा जल बीत है।
बिन अंबु  कैसे निभे, जीव जग रीत है।

जल ने आबाद किया,सत्य सुने कथनी।
जीवन  विधाता बंधु , रीति रही अपनी।
पानी  बर्बाद  किये, भावि  नहीं  बचता।
पीढ़ी अफसोस  रही, कौन कहाँ रमता।

खोज  रहा  नीर नेह , मान सम्मान को।
खो रहा  है  जो आज,नीर  वरदान को।
सूख  रहे  झील  ताल ,नदी कूप अपने।
युद्ध  से  न  सके  हार, नीर  हार सपने।
सूख  गया  नैन  नीर, पीर  देख   डरते।
सत्य बात  मान  मीत, रीत  प्रीत करते।
सिंधु नीर  बढ़ रहा, स्वाद जो  खार का।
मनुज देख मनुज संग,नेह जल हार का।
कूप  सूख  गए नीर, कृषक हताश  रहे।
नीर देते  घट आज, प्यास खुद ही  सहे।
नलकूप  खोदे  नित्य, रक्त खींच धरती।
मनुज नीर दोउ मीत,नित्य साख गिरती।
नदियों  में  डाल  गंद ,नीर करें  गँदला।
हे   मनुज  माने  मातु ,नदी नेह  बदला।
बजरी  निकाली  रेत, खेत  रहेे  खलते।
फूल  पौधे  खा गये, बाग  लगे  जलते।
छेद  डाले  भू  खेत, खोद  कूप  धरती।
पेड़  नित्य  काट  रहे, भूमि बने  परती।
रेगिस्तान  बढ़  रहा, बीत रहा  जल  है।
कौन  फिर  तेरी  सुने, बोल एक पल है।
रक्षा  कर   मीत  नीर, जीव जंतु  तरसे।
सारे  जल   स्रोत  रक्ष, देख  मेघ  बरसे।
जल बिना जीवन नहीं,सोच बने अपनी।
जीवन  बचालो  बंधु , बात यही जपनी।
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✍©
बाबू लाल शर्मा,”बौहरा”
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
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