गणतंत्र दिवस विशेष

ओज की एक रचना—
(गणतंत्र दिवस विशेष)

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(1)–
राजनीति  का  दामन  थामे  अपराधों की चोली है|
चोली चुपके से दामन के कान में कुछ तो बोली है|
अपराधी  फल  फूल  रहे हैं  नोटों की फुलवारी में|
नेता  खेला  खेल   रहे   हैं   वोटों   की  तैयारी  में|
अपराधों  का  उत्पादन  है  राजनीति  के  खेतों में|
फसल  इसी  की  उगा रहे नेता चमचों व चहेतों में|
नाच  रही  है  राजनीति  अपराधियों  के प्रांगण में|
नौकरशाही  नाच  रही  है  राजनीति  के आँगन में|
प्रत्याशी चयनित होता है जाति धर्म की गिनती पर|
हार-जीत निश्चित होती है भाषणबाजी  विनती पर|
मुर्दा भी जिन्दा  होकर  मतदान  जहाँ कर जाता है|
लोकतन्त्र का जिन्दा सिस्टम जीते जी मर जाता है|
जहाँ   तिरंगे   के  दिल पर तलवार चलाई जाती है|
संविधान  की  आत्मा  खुल्लेआम  जलाई जाती है|
वोटों   का   सौदा   होता   है  सत्ता  की  दुकानों में|
खुली  डकैती  होती  है  अब कोर्ट कचहरी थानों में|
निर्दोषों  को  न्याय  अदालत  पुनर्जन्म  में  देती  है|
दोषी   को   तत्काल   जमानत  दुष्कर्म  में  देती  है|
शोषित जब  भी  अपने अधिकारों से वंचित होता है|
लोकतंत्र  का  पावन  चेहरा  तभी  कलंकित होता है|
भ्रष्टाचारियों का विकास जब दिन प्रतिदिन ऐसे होगा|
सत्यमेव   जयते   का   नारा   भ्रष्टमेव   जयते  होगा|
(2)—
देशभक्ति  की  प्रथम निशानी सरहद की रखवाली है|
हर  गाली से  बढ़कर  शायद  देश द्रोह  की  गाली है|
जिनको  फूटी  आँख  तिरंगा  बिल्कुल नहीं सुहाता है|
निश्चित   ही  आतंकवाद   से  उनका   गहरा  नाता है|
राष्ट्रवाद   के  कथित  पुजारी   क्षेत्रवाद   के  रोगी  हैं|
देश  नहीं  प्रदेश  ही  उनके  लिए  सदा  उपयोगी  हैं|
महापुरुष  की  मूर्ति  तोड़ने  वाले  भी  मुगलों  जैसे|
गोरी, बाबर, नादिर, गजनी, अब्दाली  पगलों   जैसे|
मीरजाफरों, जयचन्दों, का  जब जब  पहरा होता है|
घर  हो  चाहे  देश  हो  अपनों  से  ही खतरा होता है|
पूत   कपूत  भले  होंगे  पर  माता  नहीं   कुमाता  है|
ऐसा  केवल  एक  उदाहरण  मेरी   भारत  माता   है|
माँ  की  आँखों  के  तारे  ही माँ को आँख दिखाते हैं|
आँखों  में  फिर  धूल  झोंककर आँखों से कतराते हैं|
भारत  माँ  के  मस्तक  पर  जब पत्थर फेंके जाते हैं|
छेद हैं  करते  उस  थाली  में  जिस  थाली में खाते हैं|
कुछ  बोलें  या  ना  बोलें  बस  इतना  तो हम बोलेंगे|
देशद्रोहियों    की   छाती   पर    बंदेमातरम्   बोलेंगे|
भारत माता  की  जय  कहने  से  जो  भी कतराते हैं|
भारत   तेरे   टुकड़े    होंगे   कहकर   के   गुर्राते   हैं|
ऐसे  गद्दारों  को  चिन्हित  करके  उनकी  नस तोड़ो|
किसी  धर्म  के  चेहरे  को आतंकवाद से मत जोड़ो|
(3)
प्रतिशोधों  की  चिंगारी  को  आग  उगलते  देखा है|
काले  धब्बे  वाला  उजला  धुँआ  सुलगते  देखा  है|
नफरत का सैलाब भरा है पागल दिल की दरिया में|
भेदभाव  का  रंग  भरा  है अब भी हरा केशरिया में|
गौरक्षक  के  संरक्षण  में  गाय  को  काटा  जाता है|
जाति-धर्म  के  चश्में  से  इन्सान  को बाँटा जाता है|
धरती से अम्बर तक जिनकी ख्याति बताई जाती है|
उन्हीं पवन-सुत की भारत में  जाति  बताई जाती है|
जातिवाद  जहरीला   देखा  सामाजिक  संरक्षण  में|
भारत   बंद   कराते   देखा   जातिगत  आरक्षण  में|
हमने   जिन्दा  इंसानों  को  जिन्दा  ही  सड़ते  देखा|
मुर्दों   को   हमने   कब्रों-शमशानों  में  लड़ते   देखा|
देखा  हमने  धर्मग्रंथ  के  आयत  और  ऋचाओं को|
ना  हो   दंगा,  नहीं   करेंगे  आपस  में  चर्चाओं  को|
देख   लिया    धर्मान्धी   ठेकेदारों    वाली    पगदण्डी|
देख  लिया  है  हमने  मुल्ला,पण्डित पापी पाखण्डी|
धर्मान्धी   लिबास   पहन  जब   मानव   नंगा   होता  है|
अमन-शान्ति की महफिल में फिर खुलकर दंगा होता है|
(4)
फसल  बाढ़  में  चौपट  भी है  नहर खेत भी सूखे हैं|
सबकी   भूख   मिटाने  वाले  अन्न-देवता   भूखे   हैं|
सबका  महल  बनाने  वाले  मजदूरों  की  छतें  नहीं|
पेड़  के  नीचे  सोते  परिवारों   के घर  के  पते  नहीं|
उजियारे  के  बिन  अँधियारा   कैसा  दृश्य बनाएगा|
फुटपाथों  पर  भूखा बचपन कैसा भविष्य बनाएगा|
माँ  के  गहने  बेंच  के  शिक्षा  सब  पूरी करते देखा|
पी. एच. डी.  बेरोजगार  को  मजदूरी  करते  देखा|
पाकीज़ा   रिश्तों   को   हमने  तार-तार  होते  देखा|
अपनी  अस्मत  को  लुटते  एक  बेटी को रोते देखा|
दरिन्दगी,  वहशी,  हैवानी,  लालच बुरी निगाहों पर|
घर  में जलती  बहू, बहन-बेटी  जलती  चौराहों  पर|
नही  समझ  में  आता  है  अब  सुबह हुई या शाम हुई|
गुलामी    आजाद   हुई   या   आजादी    गुलाम   हुई|
              —-“अली इलियास”—-
      इलाहाबाद,प्रयागराज(उत्तर प्रदेश)
             (9936842178)
  
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