KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

गया साल ये गया गया

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.  ⚡ *लावणी छंद* ⚡
*गया साल ये गया गया*

साल गया फिर नूतन आता
ऐसा चलता आया है।
हम भी कभी हिसाब लगालें,
क्या खोया क्या पाया है।

ईस्वी सन या देशी सम्वत,
फर्क करें बेमानी है।
साथ समय के चलना सीखें,
बात यही ईमानी है।

साल गया हर साल गया जो,
आगे भी फिर जाएगा।
गया समय लौट नहीं आता,
वह इतिहास कहाएगा।

समय कीमती कद्र करो तो,
सारे काम सुहाने हो,
समय गँवाना जीवन खोना,
लगते सब बेगाने हो।

इसीलिए समय संग सीखो,
सुर व कदम ताल मिलाना।
सतत सजग जीवन में रहना।
जग के व्यवहार निभाना।

जाने कितने साल बीतते,
कोई गया नया आता।
कीर्ति बची बस शेष किसी की,
बीत गया जो कब पाता।

इतिहास लिखे जाते जिनके,
मानव वर्ष कभी होते।
शेष वेश जीवन व समय को,
मन के वश में ही खोते।

इसीलिए सब जतन करो जी,
आने वाला साल नया।
पीछे पछतावा न कभी हो,
गया साल ये गया गया।
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✍✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान 9782924479
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