गरीबी मार ऐसी है,कि जो मरने नहीं देती(garibu mae aisi hai ki jo marne nhi deti)

गरीबी मार ऐसी है,
कि जो मरने नहीं देती
*बिचारा* मान देती है,
परीक्षा सख्त है लेती।
निवाले कीमती लगते,
रुपैया चाक के जैसा,
विधाता के बने लेखे,
करें ये भीख की खेती।
अनाथों को अभावों का,
सही यों साथ मिल जाता।
विधाता से गरीबी का,
महा वरदान जो पाता।
निगाहें ढूँढ़ती रहती,
कहीं दातार मिल जाए,
व्यथा को आज मैं उनकी,
सरे बाजार में गाता।
किये क्या कर्म हैं ऐसे,
सहे फल ये बिना बातें।
न दिन को ठौर मिलती है,
नही बीतें सुखी रातें।
धरा ही मात है इनकी,
पिता आकाश वासी है,
समाजों की उदासीनी,
कहाँ मनुजात जज्बातें।
.          
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479

(Visited 1 times, 1 visits today)