KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

गरीब के दीवाली(garib ke diwali)

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★★★★★★★
का छिरछिरी? का मिरचा? का गोंदली फटाखा?
का सूरसूरी अऊ थारी?नी जाने एटम के भाखा?
नी फोरे फटाखा मोर संगी,  नइ होवे जी डरहा।
दूसर के खुशी ल देखके,  खुश होवथे गरीबहा।
खाय तेल म बरे दीया, धाज आये लाली लाली।
रात भर जल रे दीया, तय ही गरीब के दीवाली।
का के नवा ओनहा अउ ,का खरीदिही साजू ?
जइसे तइसे जिनगी काटे, मांग के आजू बाजू।
छुहीगेरू के लीपईपोतई  ,आमाडारा बांधत हे।
लखमी पूजा के खातिर , जवरी भात रांधत हे।
कोन जानी कब भेजत हे मां ,घर म खुशहाली।
रात भर जल रे दीया, तय ही गरीब के दीवाली।
रिंगीचिंगी रंगोली देखके ,लइकामन मोहावत हे।
कोयला, ईंटागुड़ा , हरदी पीसके फेर रंगावत हे।
अपन कलाकारी म,सब्बोझन ला मोहे डारत हे।
मन के खुशी ह बड़े होथे, एहि बात बगरावत हे।
कृपा कर एसो अन्नपूरना,  सोनहा कर दे बाली।
रात भर जल रे दीया,  तय ही गरीब के दीवाली।
मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़

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