गुरुवर – सुकमोती चौहान रुचि

गुरुवर

गुरु है आदरणीय , दूर करता अंधेरा ।
पाकर ज्ञान प्रकाश , सफल है जीवन मेरा ।।
सद् गुरु खेवनहार , कीजिए सदैव आदर ।
कच्ची मिट्टी खण्ड , बनाया जिसने गागर ।।
गुरु के चरणों में अमृत , महिमा अपरंपार है ।
भवसागर उद्धार का , गुरु ही तो पतवार है ।।

शिक्षक ईश्वर रूप, ज्ञान का होता दाता।
नेक दिखाये मार्ग, जोड़िए इनसे नाता।।
इनसे लेकर सीख, निरंतर आगे बढ़ना।
पाकर ज्ञान प्रकाश, सदा ऊँचाई चढ़ना।।
शिक्षक ही आधार है, इस समाज में ज्ञान का।
निखारता चुन चुन सदा, सारे गुण इंसान का।।

शिक्षार्थी हैं रिक्त , भरा गागर गुरु होता ।
पाये जो सानिध्य , लगे भाग्योदय गोता ।।
सब कुछ देता गुरू , पास जो उसके रहता ।
फिर भी होत न रिक्त , पात्र उतना ही भरता ।।
उदारता गुरु की महा , उसकी सीमा है नहीं ।
रुचि करती है नित नमन , चाहे हों गुरुवर कहीं ।।

सुकमोती चौहान रुचि

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