KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

चंदन के ग़ज़ल (chandan ke gazal)

तुम्हारी यादों को आँसुओं से भिगो भिगो के मिटा रहा हूँ,
बचे हुए थे सबूत जितने समेटकर सब जला रहा हूँ.   
कि एक तुम हो जिसे परिंदों के प्यास पे भी तरस नहीं है,
मैं कतरा कतरा बचा के सबके लिए समंदर बना रहा हूँ..
ग़ज़ब की उसने ये शर्त रक्खी या वो जियेगी या मैं जियूँगा,
कई बरस से मैं मर चुका हूँ यकीन सबको दिला रहा हूँ..
नसीब लेती है कुछ न कुछ तो, कहाँ किसी को मिला है सबकुछ,
जो मेरे किस्मत में ही नहीं था, उसी का मातम मना रहा हूँ..
दगा किया था हमीं से तुमने, हमीं से रहते ख़फ़ा ख़फ़ा हो,
जो क़र्ज़ मैंने लिया नहीं था, उसी की कीमत चुका रहा हूँ..
*©चन्द्रभान पटेल ‘चंदन’*