KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

चल मेरे भाई

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चल मेरे भाई

चलो आज गुजार लेते हैं कुछ
खुशी के लमहे,
बन जाते हैं एक बार फिर
सिर्फ इंसान,और चलते हैं वहाँ
उसी मैदान में जहाँ,
राम और रहीम एक साथ खेलते हैं।
चढ़ाते हैं उस माटी का एक ही रंग
चलते हैं उस मंदिर और मस्जिद के
विवाद की भूमि पर
दोनों मिलकर बोएँगे प्रेम के बीज
चल आज उस बंजर भूमि पर
करते हैं इंसानियत की खेती
जहाँ सूरज ,हवा,पानी,माटी भी
चंदा, रात,दिन भी सब हम दोनों का है
न वे हिंदू हैं न मुसलमान
न सिख्ख ,न ईसाई
चल बढ़ चल मेरे भाई।

स्वरचित
वन्दना शर्मा
अजमेर।