छूकर मुझे बसंत कर दो

कविता/निमाई प्रधान’क्षितिज’

*”छूकर मुझे बसंत कर दो“*
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तुम बिन महज़ एक शून्य-सा मैं
जीकर मुझे अनंत कर दो ….।

पतझर-पतझर जीवन है
छूकर मुझे बसंत कर दो ।।

इन्द्रधनुष एक खिल रहा है,
मेरे हृदय के कोने में…..
बस जरुरत एक ‘हाँ’ की …
शून्य से अनंत होने में ।
छू लो ज़रा लबों को मेरे..
शंकाओं का अंत कर दो ।

जीकर मुझे अनंत कर दो ..
छूकर मुझे बसंत कर दो ।।

जीवन के हर सम-विषम में ,
मैं रहूँ तुम्हारे संग …..
मयूरपंखी इस ‘क्षितिज’ को,
मैं रंगूँ तुम्हारे रंग …
स्वर बनो तुम , बनूँ मैं व्यंजन
रहूँ तुम बिन हरदम अधूरा
मुझको स्वरे ! हलंत कर दो ।

जीकर मुझे अनंत कर दो…
छूकर मुझे बसंत कर दो ।।

तुम्हारे अश्क़ गिरे जब मेरे हृदय में
मैं तो हो गया न्यारा …..
सौंधी-सौंधी महक उठा फिर
तन-मन-जीवन सारा..
हो रहा हूँ….मैं तुम्हारा ..
ये चर्चा दिक्-दिगंत कर दो ।

जीकर मुझे अनंत कर दो…
छूकर मुझे बसंत कर दो ।।
-@निमाई प्रधान’क्षितिज

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