छोटी कविता (भूख)-राजकुमार मसखरे (Bhukh – Rajkumaar Mashkhare)

भूख

——
ये परम्परा ये आदर्श
ये संस्कार ये ईमान
आखिर कब ?
जब तक पेट भरा हो 
तब तक मचलती है !!


भूख
वह धधकती
आग की ज्वाला है
जिनकी लपटों से
सब कुछ जल कर
खाक हो जाती है !!


         —  राजकुमार मसखरे
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