KAVITA BAHAR
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जय जय भारत

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जय जय भारत

जय जय भारत, जन-मन अभिमत
जन-गण-तन्त्र विधाता।


गौरव-भाल-हिमाचल उज्ज्वल
हृदय-हार गंगा-जल,
कटि विन्ध्याचल, सिन्धु चरण-तल
महिमा शाश्वत गाता।


हरे खेत, लहरें नद-निर्झर
जीवन-शोभा उर्वर,
विश्व कर्मरत कोटि बाहु-कर
अगणित पद ध्रुव पथ पर।


प्रथम सभ्यता-ज्ञाता, साम-ध्वनित गुण-गाथा,
जय नव-मानवता-निर्माता
सत्य-अहिंसा-दाता।
जय हे! जय हे ! जय हे! शांति-अधिष्ठाता।


जन-गण-तन्त्र विधाता।
प्रयाण तूर्य बज उठे,
पटह तुमुल गरज उठे,
विशाल सत्य-सैन्य, लौह-भुज उठे।


शक्ति-स्वरूपिणि, बहुबलधारिणि, वंदित भारत-माता!
धर्मचक्र-रक्षित तिरंग-ध्वज अपराजित फहराता!
जय हे ! जय हे! जय हे! अभय, अजय, माता !
जन-गण-तन्त्र विधाता।

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