जल पर दोहे (jal par dohe)

अब अविरल सरिता बही , निर्मल इसके धार ।
मूक अविचल बनी रही, सहती रहती वार ।।
वसुधा हरी-भरी रहे, बहता स्वच्छ जलधार ।
जल की शुद्धता बनी रहे, यही अच्छे आसार ।।
नदियाँ है संजीवनी, रखे सब उसे साफ ।
जो करे गंदगी वहाँ, नहीं करें अब माफ ।।
जल प्रदूषित नहीं  करो, जीवन का है अंग ।
स्वच्छ निर्मल पावन रहे, बदले नाही  रंग ।।
*अनिता मंदिलवार सपना*
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