जाड़

जाड़
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अबड़ लागत हे जाड़ संगी
हाड़ा कपकपात हे।
आँखि नाक दुनो कोती ले
पानी ह बोहात हे।।
अंगेठा सिरा गे भुर्री बुझागे
रजाई के भीतरी खुसर के
नींद ह भगागे।।
संम्पन्नता के स्वेटर ह
गोदरी ल् बिजरात हे
गरीब मर के सड़क म
इंसानियत शरमात हे
कोनो के थाली म सीथा नई हे
कोनो महफ़िल म वो फेकात हे
कोनो जगह पानी नई हे
कोनो जगह मदिरा बोहात हे
तिल तिल के मरत इंसानियत ह
त कोनो रास रंग मनात हे
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा
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