जीवन की कल्पना

चाह नहीं मै बनूं डॉक्टर , मरीजों से पैसा पाऊं।
चाह नहीं मैं बन आई ए एस, स्कीमों में लिपटा जाऊं।
चाह नहीं मै बनूं मास्टर, ऑनलाइन क्लास लेता जाऊं।
चाह नहीं मैं बन इंजीनियर , नौकरी के लिए धक्का खाऊं।
चाह नहीं मैं बनूं वैज्ञानिक, खोजों में मै घिरता जाऊं।
मुझे बनाकर एक सैनिक, उस पथ पर तुम देना फेंक।
विचारों में हिंसा लेकर, हिंसक आएं जहां अनेक।।
हिंसकों को यमपुर पहुंचाते , यदि मै भी मारा जाऊं।
चाह नहीं मैं बनूं महान, फूलों से नवाजा जाऊं।
मुझे जला लेना है मित्रों, उस मिट्टी में तुम देना फेंक।
जिस मिट्टी में हल चलाने, आवें भारत के कृषक अनेक।।

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