जीवन में रंग भरने दो

कैसे हो जाता है मन 
ऐसी क्रूरता करने को?
अपना ही लहू बहा रहे
जाने किस सुख वरणे को ?

आधुनिक प्रवाह में बहे
चाहें जीवन सुख गहे 
वासनाओं के ज्वार में
यूंअचेतन उमंगित रहे

अंश कोख में आते ही
विवश क्यों करते मरने को?

अंश तुम्हारे शोणित का
भावी वंशज कहलाते हम
किस हृदय से कटवा देते ?
होता नहीं तनिक भी गम

कसूर क्या है बोलो हमारा
क्यों रोक लेते जन्म धरने को?

नहीं अधिकार हैतुम्हारा
यूँ हमें  खतम करने का
ईश्वर की कृति है हम
अवसर दो जनम लेने का

अनचाहा कभी न समझो
हमें धरा पर उतरने दो

बेटी हो या बेटा हम
हैं तो तुम्हारा ही खून
क्रूरता छोड़ो हे जनक जननी
छाया है कैसा जुनून

स्वप्न पालों हमारी खातिर
जीवन में रंग भरने दो

सुधा शर्मा
राजिम छत्तीसगढ़
18-12-2018

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