झन निकलबे खोंधरा ले (Jhan nikalbe khondhra le)

देख संगवारी सरी मंझनिया ,
झन निकलबे खोंधरा ले !
झांझ हे अब्बड़ बाड़ गेहे ,
पांव जरथे भोंभरा ले !!
गरम- गरम हवा चलत हे ,
बिहनिया ले संझा !
आँखी मुड़ी ल बिन बांधे ,
कोनो डहर झन जां !!
सुख्खा पड़गे डोंड़गा नरवा,
सुन्ना पड़गे तरिया कुँआ !
रूख राई ठूकठूक दिखत ,
खोर्रा होगे अब भुईया !
गाय गरूवा चिरई चिरगुन के,
होगे हे बड़ करलाई !
दूरिहा दूरिहा ले पानी नई दिखे ,
कईसे प्यास बुझाही !!
ताते तात झांझ के कारन
घर ले निकलेल नई भाए ,
पंखा कुलर के कारन
पानी बड़ सिराय !
     दूजराम साहू
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