तितलियां ख़्वाब देखती है

तितलियां ख़्वाब देखती है
उड़ने का
आसमान छूने का
साहिल को पार करने का
अपने हुस्न की खूबसूरती के साथ
अपने रंग बिरंगे पंखों के समान
जीवन मे रंग भरना चाहती है
वो उड़ना चाहती है
कुछ नही तो
सम्मान से जीना चाहती है।
और पूछना चाहती है तुमसे
क्यों जब भी उसे देखते हो तुम
उसे कुचलना चाहते हो ?
क्या बिगाड़ा उसने तुम्हारा ?
बहने दो, उड़ने दो, आजादी से रहने दो
ये उनकी जिंदगी है उन्हें शौक से जीने दो
क्योंकि वो ख़्वाब देखती है
हाँ ये सच है
तितलियां ख़्वाब देखती है

*कवि राहुल सेठ “राही”*

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