तू रोना सीख

कविता/निमाई प्रधान’क्षितिज’

*तू रोना सीख !!*
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तू !
रोना सीख ।

अपनी कुंठाओं को
बहा दे…
शांति की जलधि में
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को
तू खोना सीख ।
तू ! रोना सीख ।।

कितने तुझसे रूठे ?
तेरी बेरुख़ी से…
कितनों के दिल टूटे ?
किनके भरोसे पर खरा न उतर सका तू ?
तेरे ‘मैं’ ने किनको शर्म की धूल चटा दी?
कौन तेरी मौजूदगी में सर न उठा सका?
उन सबकी सम्वेदनाओं को
निज-अश्रुओं से भिगोना सीख ।
तू! रोना सीख ।।

तू रोना सीख
कि रोने से दिल कुलाचें भरता है ।
तू रोना सीख
कि रोने से…
दीन-दुःखियों के प्रति ममत्व झरता है ।
तू रोना सीख कि आजकल कोई रोता नहीं है
तू रोना सीख कि आजकल कोई अपना नहीं है
कुछ ऐसा कर…
कि औरों को भी ज़िंदगी मिले
तू सबके नाते ख़ुशियाँ बोना सीख ।
तू रोना सीख ।।

तू…रोना सीख…!!
*-@ निमाई प्रधान’क्षितिज’*

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