तो क्या कहने?

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तो क्या कहने?

होली के बाद
समय के साथ
रंग अबीर धुल जायेंगे.
मन से मैल भी
जो धो पाओगे
तो क्या कहने.

हाँ माना
अपनों से लिपट जाओगे
अपनी खुशी खातिर
पर गैरों से लिपटोगे
उनके खातिर
तो क्या कहने.

है सत्य
श्वेत का वजूद
अश्वेत चितकबरे से
जब सब रंग
जीवन में अपनाओगे
तो क्या कहने…

पर लगता है-
वो क्या खेलेंगे होली ?
जो तन के रंगों से,
उबर ना पाये.
जो न खेल पाओगे
तो क्या कहने….

🖊मनीभाई नवरत्न छत्तीसगढ़

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