दशहरा-शैलेन्द्र कुमार चेलक ( Dashhara based kavita)

             दशहरा


जैसे नया वर्ष आते ही ,
लोग मन ही मन संकल्प लेते हैं ,
आत्म आंकलन कर ,
सच का विकल्प लेते हैं ,
बुराइयों को छोड़ ,
अच्छाईयों को अपनाएंगे ,
गौतम -गांधी की तरह ,
हम भी अच्छे बन पायेंगे ,
वैसे ही कोई हिन्दू दशहरा के दिन 
रावण दहन के बाद ,
और कोई मुस्लिम ईद पर 
नमाज़ के बाद ,
पर जैसे -जैसे दिन गुज़रता है
रावण फिर जिंदा हो जाता है ,
और हमारी सारी संकल्प  
धरि की धरि रह जाती है ,
अन्तर्रात्मा यह 
बार बार कह जाती है 
सब में ज्ञान और योग्यता अंतर्निहित है ,
फिर यह कैसी विरोधाभास है,
पल -पल जिंदा होता है रावण ,
हर कही उसी का आभास है ,
रावण के नाना रूप दिखते हैं 
कुछ बिकवाता है ,कुछ स्वयं बिकते है,
अत्याचारी ,भ्रष्टाचारी ,आतंकवादी ,
ये सब लूटते हैं असहाय जनो को ,
दुरस्त बसे निर्धनों को ,
क्योंकि कुछ  तो लूटने को , 
खुद को लुटाते है ,
पता नही ये पैदा करते हैं रावण 
या आप ही आप पनप जाते हैं,
हाल ऐसा ही रहा तो 
घर में ही बार -बार सीता का हरण होगा ,
राम जैसे कहते रह जाएंगे ,
मुस्कुरा रहा रावण होगा ,
अट्टहास करते बुराई (रावण) को ,
न आने दो मन मे ,
राम धारो आत्मा में ,
अयोध्या हो तन में ,
रावण देखो अपना ,
न दुनियावी वन में ,
राममय दिखे जहाँ ,
हर किसी का राम हो जीवन मे  ,

                       –शैलेन्द्र चेलक
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