दिव्य-पायलिया

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.   *मधुमालती छंद* 
विधान.  २२१२,२२१२
.            .    *दिव्य-पायलिया*
.      *माँ*…जानकी
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पद पायलें, अनमोल थी,
सिय राम के,मन बोल थी।
दसकंठ  ने, हर जानकी,
बाजी लगा, दी जान की।

हाः राम जी,प्रभु मान भी,
मानी न मैं,वह आन भी।
दशकंठ ली, हर पातकी,
दोषी बनी ,निज जानकी।

क्रोधी  जटायू  था  भिड़ा,
जाने न दे ,सिय को अड़ा।
सिय राम के,हित मान की,
चिंता नहीं , तब  जान की।

पथ में लखे,कपि थे भले,
पटकी वही,..पद पायलें।
मग शैल वे, पहचान  की,
मन सोच के,तब जानकी।

वन राम जी, मग डोलते,
खोजत फिरे ,मन बोलते।
बजती,सुने,सिय मान की,
मन पायले, बस जानकी।

हनुमान जी, द्विज वेष में,
प्रभुभक्ति के, परिवेश मे।
प्रभु से कही,अरमान की,
वन राम के, मन जानकी।

गिरि पे  मिले, सुग्रीव से,
मन मीत से, भगवान से।
कहि बंधु के,वरदान की,
करि खोजने,प्रण जानकी।

प्रभुराम जी,कहि भ्रात से,
लक्ष्मण सुनें,मन ध्यान से।
पायल यही ,क्या जानकी,
भैया, क्षमा,मम जान की।

पद पूज्य वे ,पहचान के,
रज पूजता ,पद मात के।
पर पायलें, नहि भान की,
पदरज नमन,माँ जानकी।

जग मात है,  वरदान है,
सिय भारती ,पहचान है।
रघु वंश के ,सन् मान की,
रघुवर प्रिया,माँ जानकी।

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✍,©
बाबू लाल शर्मा”बौहरा”
सिकन्दरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
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