दीप शिखा (deepshikha)-बाबू लाल शर्मा, बौहरा

 *दीप शिखा* 

सुनो:- बेटियों जीना है तो,
उसी शान से मरना सीखो।
या तो दीपशिखा हो जाना,
या  घटनाएं पढ़ना  सीखो।

मनुबाई भी दीपशिखा थी,
भारत में राज फिरंगी था।
दुश्मन पर भारी पड़ती थी,
अंग्रेज़ी  राज   दुरंगी  था।

बहा पसीना उन गोरों को,
कुछ द्रोही रजवाड़े में।
तलवार थाम हाथों में रानी,
उतरी युद्ध अखाड़े में।

अंग्रेज़ी पलटन में  उसने,
भारी मार मचाई थी।
पीठ  बाँध  निज बेटे को,
वह समर क्षेत्र में आई थी।

अब भी पूरा भारत गाता,
रानी तो मरदानी थी।
मनुबाई छबीली रानी की,
वह तो अमर कहानी थी।

पीकर देश प्रेम की हाला,
रण चण्डी दीवानी थी।
खूब लड़ी मरदानी वह जो,
तुमने सुनी कहानी थी।

भारत की  बिटिया थी वे,
झाँसी  की महा रानी थी।
हम भी साहस सीख सके,
ऐसी रची  कहानी थी।

दिखा गई पथ सबको वह,
आन मान सम्मान रहे।
मातृभूमि के हित में लड़ना,
जब  तक  तन में प्राण रहे।

नत मस्तक नही होना बेटी,
देख स्वयं नाजुक काया।
कुछ पाना तो पाओ अपने,
बल,कौशल,प्रतिभा, माया।

स्वयं सुरक्षा कौशल सीखो,
सबके दुख संताप मिटे
दृढ़ चित बन कर जीवन में,
व्यवहारिक संत्रास घटे।

मलयागिरि सी बनो सुगंधा,
कोयल बुलबुल सी चहको।
स्वाभिमान के खातिर बेटी,
काली चण्डी सी दहको।

तुम भी दीप शिखा के जैसे,
रोशन हो तम  हर जाना।
झांसी  की  महा रानी जैसे,
पथ आलोकित कर जाना।

बहिन,बेटियों साहस रखो,
मरते  दम  तक  श्वांसों में।
रानी झाँसी बन कर जीना,
नहीं आना जग  झाँसों में।

बचो, पढ़ो व बढ़ो बेटियों,
चतुरसुजान सयानी हो।
अबला से सबला बन कर,
झाँसी  सी  मरदानी हो।

दीपक में  बाती सम रहना,
दीपशिखा ,रोशन होना।
सहना नहीं है अनाचार को,
अगली पीढ़ी से कहना।

बाबू लाल शर्मा, बौहरा, सिकन्दरा
जिला–दौसा,राजस्थान

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