KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

देता हूँ शुभकामना, संग बधाई मानना(deta hu subhkamna sang badhai maanna)

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 *मनहरण घनाक्षरी छंद* 
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देता हूँ शुभकामना, संग बधाई मानना,
सम्वत नव वर्ष हो, शुद्ध  मन  भाव से।
लोकतंत्र  मान कर, सब मतदान  कर,
भली  सरकार चुन, सत्य सद भाव से।
हित बलिदान कर, पर हित  दान कर,
रहे न गरीब  कोई, दुखिया अभाव से।
ज्ञान दीप उजियार,कर्म कर भूमि धार,
सब जन सुखी रहे, प्रीत के  प्रभाव से।
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होली की उमंग बाद,कुहुक रही कोयलें,
चैत  माह  नये  नयेे, पात   पेड़  धारते।
खेत में किसान देख, फसल कटाई करे,
स्वेद बिन्दु स्वाति यश, काम  तन हारते।
गर्म हवा पछुवाई, ग्रीष्म के संदेश लाई,
दिनकर  कोप  करि,  ताप  तन जारते।
शीतला,गणगौर माता,रामनवमी चैत में,
नव  अन्न  आए  घर, नया  साल मानते।
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समय चक्र चलता, अवसर भी मिलता,
ठहरते  दोऊ   नहीं, पाए  तो  भुनाइये।
जैसा मिले खा पहन, शुद्ध रहन सहन,
आदर मान मान के, बोल तो  सुनाइये।
अच्छे गीत बोलकर, शब्द भाव तोलकर,
साँच  झूठ  जान कर, मीत  भी  बनाइये।
दिन वार त्यौहार, सोच जग व्यवहार,
नया सम्वत आ रहा, पर्व ये  मनाइये।
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न जाने कितने गये,आएँगे फिर से नए,
इंसान बस  मनाता, कब  से  सु वर्ष है।
रीत प्रीत और गीत,शासन व सत्ता नीति,
मानवीय  हित  साध,  अब  से  सहर्ष  है।
आन बान मय शान, देश भक्ति अरमान,
मानवता  का सम्मान, जन से  उत्कर्ष है।
विकास के भरम में,विज्ञान के चरम में,
देश,धर्म, जाति  पंथ, सब से  संघर्ष है।
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चैत माह चेत नर, मातु संग हेत कर,
नव  परिवेश संग, आई  नव साल है।
विकास मान देश हो, नवीन परिवेश हो,
चमके जैसे चन्द्रमा, भारती का भाल है।
पास के पड़ौसी देश,रखे खूब मन द्वेष,
पालते आतंककारी, भेदनी  वे चाल हैं।
जवान व किसान के,देश स्वाभिमान के,
दोहे गीत छंद गाता, शर्मा बाबू लाल है।
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आता नया साल जब, छाए मन रंग तब,
माह चैत्र लगे तब,मौसम सुहाना है।
प्यार प्रेम प्रीत संग,नेह देह दुलार अंग,
आशीषों की कामना,मिलना बहाना है।
सैनिक की सलामती, मौज़ मात भारती,
चैन में किसान रहे,गाना वो तराना है।
हर हाथ काम मिले,हर डाल फूल खिले,
राष्ट्र गीत राष्ट्र गान,हर कंठ गाना है।
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समय चक्र चले है, सुरीति प्रीत पले है,
गये लौट आए नहीं, कीमत तो जानिए।
बीत गया जो बीतना,जल घट सा रीतना,
वर्तमान साध बस, बात यही मानिए।
आया नव वर्ष यह, चैत्र मने हर्ष यह,
नवरात्रि साधना से, आत्मबल पाइए।
फसले पकी है सारी,शक्तिपुंज जीवधारी,
नए वर्ष नवरात, नवगीत गाइए।
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बदले सम्वत वर्ष,बीता समय सहर्ष,
घर घर पर्व मने,    मिलके मनाइए।
खीर खाँड पूरी साग,जैसा जैसे मिले भाग,
हँसी खुशी जीम कर,   सबको  जिमाइए।
गले मिलो प्रेम संग,एकता न होवे भंग,
प्रीत रंग घोल कर,   नेह को निभाइए।
दोहा पद गीत छंद  ,  गज़ल बने पसंद,
मीठी वाणी बोल कर ,  सबको  सुनाइए।
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✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
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