दो सेदोका

{01}

पेड़ों का दुःख 
कुल्हाड़ी की आवाज 
सुन कर मनुष्य 
रहता चुप
धूप से तड़पती
बूढ़ी पृथ्वी है मूक ।

    ~~●~~

    {02}

मौसमी मार
पेड़ हुए निर्वस्त्र 
पत्तियाँ समा गईं 
काल के गाल
फूटो नई कोंपलें 
क्यों करो इंतजार ?

   ~~●~~

□ प्रदीप कुमार दाश “दीपक”
        (छत्तीसगढ़)

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