KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नारी की सूखे गुलाब की तरह वजूद को बताते कवयित्री विजिया गुप्ता समिधा जी ये रचना, जरूर पढ़िये (mai hu naa)

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

*मैं हूँ ना*
मेरी साँसों में बसे हो तुम,
प्राणवायु की तरह।
हृदय के स्पंदन में,
मधुर संगीत की तरह।
सुबह की पहली किरण से,
रात के अंतिम चरण तक।
केवल,तुम ही तुम हो।
तुम्हारे घर की देहरी,
आज भी मेरी लक्ष्मण रेखा है।
तुमसे जुड़े रिश्ते आज भी,
सबसे ऊपर है।
अशेष विषमताओं के बाद भी,
खिली खिली रहती हूँ।
हर जिम्मेदारी,
पूरी ईमानदारी से निभाती हूँ।
फिर क्यों? 
सबकी नज़रों में खटकता है,
मेरा बन सँवर कर रहना।
हँसना खिलखिलाना
तुम्हीं बताओ! 
सफेद साड़ी में लिपटी,
डरी सहमी बेजान सी 
बनी रहती यदि मै।
तो क्या यही स्वरूप,
मेरे मर्यादित चरित्र का
हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र होता?
घुट-घुट कर मर जाती मैं।
अतीत के पन्नो में
दबकर रह जाती,
सूखे ग़ुलाब की तरह।
क्या  निभा पाती?
तुम्हारी अधूरी जिम्मेदारियों को,
पूरी तरह।
कौन रखता ?
तुम्हारे अबोध बच्चों के
सिर पर हाथ 
और कहता अनाथ नहीं हो तुम
“मैं हूँ ना”। 
———
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग छत्तीसगढ़

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.