KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नज़र आता है

नज़र आता है

हर अक्स यहाँ बेज़ार नज़र आता है,
हर शख्स यहां लाचार नज़र आता है।

जीने की आस लिए हर आदमी अब,
मौत का करता इंतजार नज़र आता है।

काम की तलाश में भटकता रोज यहाँ
हर युवा ही बेरोजगार नज़र आता है।

छाप अँगूठा जब कुर्सी पर बैठा तब,
पढ़ना लिखना बेकार नज़र आता है।

भूखे सोता गरीब, कर्ज़ में डूबा कृषक
हर बड़ा आदमी सरकार नज़र आता है।

गाँव शहर की हर गली में मासूमों संग,
यहाँ रोज होता बलात्कर नज़र आता है।

और क्या लिखोगे अब दास्ताँ ‘प्रियम’
सबकुछ बिकता बाज़ार नज़र आता है।

©पंकज प्रियम