KAVITA BAHAR
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न यह समझो कि हिन्दुस्तान की तलवार सोई है

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न यह समझो कि हिन्दुस्तान की तलवार सोई है


न यह समझो कि हिन्दुस्तान की तलवार सोई है।


जिसे सुनकर दहलती थी कभी छाती सिकंदर की,
जिसे सुनकर कि कर से छूटती थी तेग बाबर की,
जिसे सुन शत्रु की फौजें बिखरती थीं, सिहरती थीं,
विसर्जन की शरण ले डूबती नावें उभरती थीं।
हुई नीली कि जिसकी चोट से आकाश की छाती,
न यह समझो कि अब रणबाँकुरी हुंकार सोई है। न यह…


कि जिसके अंश से पैदा हुए थे हर्ष और विक्रम,
कि जिसके गीत गाता आ रहा संवत्सरों का क्रम,
कि जिसके नाम पर तलवार खींची थी शिवाजी ने,
किया संग्राम अन्तिम श्वाँस तक राणा प्रतापी ने,
किया था नाम पर जिसके कभी चित्तौड़ ने जौहर,
न यह समझो कि धमनी में लहू की धार सोई है। न यह…

दिया है शान्ति का संदेश ही हमने सदा जग को,
अहिंसा का दिया उपदेश भी हमने सदा जग को,
न इसका अर्थ हम पुरुषत्व का बलिदान कर देंगे,
न इसका अर्थ हम नारीत्व का अपमान सह लेंगे।
रहे इंसान चुप कैसे कि चरणाघात सहकर जब,
उमड़ उठती धरा पर धूल, जो लाचार सोई है। न यह …


न सीमा का हमारे देश ने विस्तार चाहा है,
किसी के स्वर्ण पर हमने नहीं अधिकार चाहा है,
मगर यह बात कहने में न चूके हैं, न चूकेंगे।
लहू देंगे मगर इस देश की माटी नहीं देंगे।
किसी लोलुप नजर ने यदि हमारी मुक्ति को देखा,
उठेगी तब प्रलय की आग जिस पर क्षार सोई है। न यह


रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

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