परिधि (Paridhi kavita)

परिधि
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भावनाओं से जुड़ी हर बात
जीवन में हर मोड़ पर
जब करने लगे आघात
यंत्रणा झेलकर पाने को निजात
आदमी अक्सर बिखर जाता है
रक्त सम्बन्ध
लगने लगते हैं फीके
बदल जाते हैं
सम्बन्धों के तौर तरीके
स्वार्थ साधन के लिए
भावनाओं का सम्मान ठहर जाता है
समाज बिरादरी के साथ
सामंजस्य बिठाने के लिए
स्वीकारना हर कोई बात
अविवेकपूर्ण हो तब भी
छाती पर रख कर पत्थर
जीते जी ही आदमी मर जाता है
पद्म मुख पंडा**स्वार्थी**
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