KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

पर्यावरण

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दोहे-पर्यावरण
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प्रकृति सृजित सब संपदा, जनजीवन आधार।
साधे सुविधा सकल जन ,पर्यावरण सुधार।।1।।

जीवन यापन के लिये,शुद्ध हवा जलपान।
पर्यावरण रक्षित है ,जीव जगत सम्मान।।2।।

धरती, गगन, सुहावने,  पावक  और समीर।
पर्यावरण शुद्ध रहे , रहो सदा गंभीर।।3।।

विविध विटप शोभा बढी, सघन वनों के बीच।
पर्यावरण है सुरक्षित, हरियाली के बीच।।4।।

रहे सुरक्षित जीव पशु, वन शोभा बढ जाय।
शुद्ध पर्यावरण रहे,  सकल व्याधि मिट जाय।।5।।

बारिद बरसे समय पर, ऊखिले खेत खलिहान।
पर्यावरण सुहावना, मिले कृषक को मान।।6।।

पर्यावरण रक्षा हुई, प्रण को साधे शूर।
धरती सजी सुहावनी,मुख पर चमके नूर।।7।।

पेड़ काट बस्ती बसी ,पर्यावरण विनाश।
बढा प्रदूषण शहर में,कैसे लेवे सांस।।8।।

गिरि धरा के खनन में,बढा प्रदूषण आज।
पर्यावरण बिगड़ गया, कैसे साधे काज।।9।।

संख्या अगणित बढ गई , वाहन का अति जोर।
पर्यावरण बिगड़ रहा   , धुँआ घुटा चहुँओर।।10।।

ध्वनि प्रदूषण फैलता, बाजे डी.जे.ढोल।
दीन्ही पर्यावरण में, कर्ण कटु ध्वनि घोल।।11।।

पर्यावरण बिगाड़ पर, प्रकृति बिडाड़े काज।
अतिवृष्टि व सूखा कहीं, कहीं बाढ के ब्याज।।12।।

दूषित हो पर्यावरण, फैलाता है रोग।
शुद्ध हवा मिलती नहीं, कैसे साधे योग।।13।।

जन जीवन दुर्लभ हुआ,छाया तन मन शोक।
पर्यावरण बिगाड़ पे,कैसे लागे रोक।।14।।

चेत मनुज हित सोचले, पर्यावरण सुधार।
रक्षा मानव जीव की, पर्यावरण सुधार।।15।।