प्रभु

प्रभु
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शून्यता से पूर्णता
अनन्त तुम्हारा विस्तार है।
सृष्टि के कण कण में विराजित
तेरा ही साम्राज्य है।

आख्यान तुम व्याख्यान  हो
अपरिमेय संपूरित  ज्ञान हो
हे अनादि अनदीश्वर तुम्ही
सांख्य विषय कला और विज्ञान हो।

सूत्र हो सूत्र धार हो
नियति तुम करतार हो
हो परिभाषित संचिता
अपरिभाषित तुम भरतार हो।

जग नियंत्रक परिपालक
संहारक प्राणवान हो
उदित जीव जीवात्मा
के बस तुम्ही आधार हो।

हूँ अबोध शिशु तेरा
मर्म न तेरा जान सका
आदि तुम अंत तुम
परम् सत्य न पहचान सका।

तुम नसों में बहते रुधिर
स्वांस और उच्छ्वास हो
रोम रोम में बसते प्रभु तुम
प्रतिपल मेरे पास हो
कण कण में निवास हो।
©अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा
छत्तीसगढ़

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