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प्रेम की परिभाषा

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प्रेम की परिभाषा

प्रेम वो धुरी है
जिसके बिना
जिंदगी अधुरी है।


प्रेम जरूरी है
छलछद्म,ईर्ष्या
बहुत ही बुरी है।


प्रेम संसार है
सुख शांति का
एक आधार है।


प्रेम  शक्ति है
ईश्वरीय दर्शन
श्रद्धा भक्ति है।


प्रेम अनुराग है
मात्र चाह नहीं
सच्चा त्याग है।


प्रेम परीक्षा है
मानव बनने की
एक दीक्षा है।


प्रेम प्रतीज्ञा है
संकट क्षण में
सच्ची प्रज्ञा है।


प्रेम  सूक्ति है
मोह माया से
मोक्ष मुक्ति है।


प्रेम परमात्मा है
प्रतिशोध से दूर
त्रुटि पर क्षमा है।

प्रेम वो डोर है
दोनों ही सिरा
जन्नत ओर है।


प्रेम एक रंग है
ख़ुदी खोने की
सरल  ढंग  है।

प्रेम क्या है?
दिल की तू सुन
वहां सब बयां है।


✒️ मनीभाई’नवरत्न’, छत्तीसगढ़

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