प्रेम तो,मैं करता नहीं

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*प्रेम तो,मैं करता नहीं*
(रचनाकाल:-१४फरवरी २०१९,प्रेम दिवस)

यूं किसी पे ,मैं मरता नहीं।
हां! प्रेम तो,मैं करता नहीं।

प्रेम होता तो,
ना होता खोने का डर।
प्रेम के सहारे
कट जाता मेरा सफर।
दुख दर्दों से
रहता  मैं कोसों दूर।
मैं ना होता
कभी विवश मजबूर।
विरह मुझको,खलता नहीं।
छुपके आहें,मैं भरता नहीं।
हां! प्रेम तो ,मैं करता नहीं।

सताती नहीं
लाभ हानि की चिंता।
सदा ही जीता
जो कह गई है गीता।
ना शिकवा होती
ना ही किसी से आशा।
पर क्या है प्रेम?
समझा नहीं परिभाषा।
अर्थ इसके,  टिकता नहीं।
गर है तो,क्यूं दिखता नहीं?
हां! प्रेम तो ,मैं करता नहीं।

जहां प्रेम है
वहां धर्म,जाति किसलिए?
रंग रूप भेद
सरहद-दीवार किसलिए?
राग द्वेष निंदा
प्रेम के शब्दकोश में कहां?
और ईर्ष्या बगैर
प्रेम का अस्तित्व भी कहां?
प्रेम में वश मेरा चलता नहीं।
प्रेम कर हाथ मैं मलता नहीं।
हां! प्रेम तो ,मैं करता नहीं।।
✒️ *मनीभाई’नवरत्न’छत्तीसगढ़*

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