प्रेम से बड़ा इस दुनिया में कोई उत्तम मार्ग नहीं (अथाह प्रेम)

विषय – प्रेम और शहनाई
शीर्षक- अलौकिक प्रेम
विधा -कविता
रचनाकार -बाँके बिहारी बरबीगहीया
राज्य -बिहार बरबीघा (पुनेसरा)

अन्नय प्रेम है तुझसे री
तेरे स्वर लहरी की मधुर तान।
तुम प्रेम की अविरल धारा हो
मुख पे तेरी है मिठी मुस्कान ।
मेरे मन में बसी है तेरी छवि
तुम्हें देख के मेरा होय विहान।
मैं व्यथित, विकल हूँ तेरे लिए
हे प्रिय तुम्हीं हो मेरे प्राण ।
शीतल सुरभित मंद पवन भी
देख-देख तुम्हें शरमाई ।
पिया मिलन की आस में फिर
कहीं दूर पुकारे शहनाई ।।

दर्पण सा तेरे मुखड़े में
मैं खोकर हो गया विभोर ।
तेरी आँखो की इन गहराई में
सागर की भाँति उठ रही हिलोर।
खुद को भूला तुझे देख के री
हे मृगनयनी तू हो चितचोर ।
रश्मियाँ सी जब लगी संवरने
तब जाकर कहीं हुआ अंजोर ।
तेरे प्यार की खुशबू ऐसे बहे
जैसे बहती हो पुरबाई ।।
पिया मिलन की आस में फिर
कहीं दूर पुकारे शहनाई ।।

उपवन की सारी कलियाँ भी
तेरे अंग-अंग को रहीं सँवार।
अम्बर में तेरी एक छवि लिए
कब से मेरी आँखे रही निहार।
बादल बनकर अब बरसो री
मेरा मन कब से तुम्हें रहा पुकार।
आहट सुनकर विचलित होता
कब कहोगी तुम हो प्राण आधार।
तेरे आने की दे गई निमंत्रण
उपर से आई एक जुन्हाई ।
पिया मिलन की आस में फिर
कहीं दूर पुकारे शहनाई ।।

?सर्वाधिकार सुरक्षित?

बाँके बिहारी बरबीगहीया

✒मेरी प्यारी मेरी शहनाई✒

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